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Ram Charit Manas - Daily Prayer


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प्रार्थना

दो.-    मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर ।
    अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु विषम भव भीर ।।

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला । मंदरू मेरू कि लेहि मराला ।।
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी । दीन बंधु उर अंतरजामी ।।
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें । सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें ।।
सेवक सुत पति मातु भरोसें । रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ।।
असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ।।
मोरें तुम्ह प्रभु गुरू पितु माता । जाऊँ कहाँ तजि पद जलजाता ।।
बालक जान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ।।
बार बार मागऊँ कर जोरें । मनु परिहरै चरन जनि भोरें ।।

दो.-    श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर ।
    त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ।।

Ram Charit Manas - Monday

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परम धर्म 

(सोमवार)

दो. -  गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन ।
     बिनु हरि कृपा न होर्इ सो गावहिं बेद पुरान ।।

धरमु न दूसर सत्य समाना । आगम निगम पुरान बखाना ।।
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । पर निंदा सम अघ न गरीसा ।।
पर हित सरिस धर्म नहिं भार्इ । पर पीड़ा सम नहिं अधमार्इ ।।
परहित बस जिन्ह के मन माहीं । जिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ।।
साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ।।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहिं जग जस पावा ।।
अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।

दो.- उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ।
    निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ।।

Ram Charit Manas - Tuesday

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सदाचार 

(मंगलवार)

दो.- सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ ।
         तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनन्दन दोउ ।।

काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ।।
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया । तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ।।
सब के प्रिय सब के हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी ।।
कहहिं सत्य प्रिय वचन बिचारी । जागत सोवत सरन तुम्हारी ।।
तुम्हहिं छाड़ि गति दूसरि नाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ।।
जननी सम जानहिं परनारी । धनु पराव विष तें विष भारी ।।
जे हरषहिं पर संपति देखी । दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी ।।
जिन्हहिं राम तुम्ह प्रानपिआरे । तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ।।

दो.- स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्हके सब तुम्ह तात ।
         मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ।।

Ram Charit Manas - Wednesday

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संत-लक्षण 

(बुधवार)

दो.- सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम
     ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ।।

अमितबोध अनीह मितभोगी । सत्यसार कबि कोबिद जोगी ।।
सावधान मानद मदहीना । धीर धर्म गति परम प्रबीना ।।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं । पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ।।
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती । सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती ।।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा । गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ।।
श्रद्धा छमा मैयत्री दाया । मुदिता मम पद प्रीति अमाया ।।
बिरति विबेक बिनय बिग्याना । बोध जथारथ बेद पुराना ।।
दंभ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ।।

दो.- निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज ।
         ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज ।।

Ram Charit Manas - Thursday

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सद्‍नीति 

(गुरुवार)

दो.- ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग ।
         होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ।।

सरल सुभाव न मन कुटिलार्इ । जथा लाभ संतोष सदार्इ ।।
बैर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा ब आसा ।।
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । परूष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ।।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अवगुनक्न्ह दुरावा ।।
देत लेत मन संक न धरर्इ । बल अनुमान सदा हित करर्इ ।।
बिपति काल कर सतगुन नेहा । श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।।
आगें कह मृदु बचन बनार्इ । पाछें अनहित मन कुटिलार्इ ।।
जा कर चित अहि गति सम भार्इ । अस कुमित्र परिहरेहिं भलार्इ ।।

दो.- पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।
          ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ।।

Ram Charit Manas - Friday

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विजय-रथ 

(शुक्रवार)

दो.- वचनकर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम ।
     तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा विश्राम ।।

सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ।।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ।।
बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ।।
र्इस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ।।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ।।
अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ।।
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम विजय उपाय न दूजा ।।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ।।

दो.- महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर ।
     जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ।।

Ram Charit Manas - Saturday

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श्रीराम-नाम 

(शनिवार)

दो.- जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।
         बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ।।

ब्रह्म अनामय अज भगवंता । व्यापक अजित अनादि अनंता ।।
हरि बयापक सर्वत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ।।
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कह अधिक एक तें एका ।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।।
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं । सकल अमंगल मूल नसाहीं ।।
करतल होहिं पदारथ चारी । तेर्इ सिय रामु कहेउ कामारी ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी । भव बंधन काटी नर ग्यानी ।।
जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ।।

दो.- राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरी द्वार ।
     तुलसी भीतर बाहेरहुँ जो चाहसि उजिआर ।।

Ram Charit Manas - Sunday

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प्रथम कर्त्तव्य 

(रविवार)

दो. -  जड़ चेतन गुन दोषमय विस्व कीन्ह करतार ।
    संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि वारि विकार ।।

प्रातः पुनीत काल प्रभु जागे । अरूनचूड़ बर बोलन लागे ।।
प्रातःकाल उठिकै रघुनाथा । मातु पिता गुरु नावहिं माथा ।।
मातु पिता गुरु प्रभु कै बानी । बिनहिं विचार करिअ सुभ जानी ।।
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु वचन अनुरागी ।।
तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ।।
करर्इ जो करम पाव फल सोर्इ । निगम नीति असि कह सबु कोर्इ ।।
कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ।।
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदय राखि कौसलपुर राजा ।।

दो.- सो अनन्य जाकें असि मति न टरर्इ हनुमंत ।
        मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ।।